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कर्मयोग एवं ज्ञानयोग का सार भक्तियोग में निहित

यशमन्त सिंह

2025 · DOI: 10.61410/10.61410/had.v20i1.224
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Abstract

गीता में कर्मयोग का संदेश प्रमुखता से दिया गया है, जिसका भाव है अनासक्त भाव से कर्म करना या कर्मों के फल के प्रति आसक्ति रहित कर्म करना या कर्म फल का समर्पण ईश्वर को करते हुए जीवन यापन करना, जिससे मनुष्य कर्म फल भोगने के लिए बार-बार शरीर धारण न करे और शरीर बन्धन से छुटकारा मिल जाये। ज्ञान योग का अर्थ है मन, चित्त एवं आत्मा का ईश्वर में स्थिर हो जाना या ईश्वर से तादात्म्य स्थापित कर लेना या ईश्वर में ही मिल जाना परन्तु यह निर्गुण निराकार ईश्वर की उपासना है जो सबसे कठिन मार्ग है। परन्तु भक्तियोग या भक्ति मार्ग ईश्वर प्राप्ति का सबसे सरल एवं सहज मार्ग है, क्योंकि इसमें आपके जैसा दिखने वाला कोई व्यक्ति ही तत्त्वदर्शी गुरु के रूप में आपका सहायक होता है जिसकी कृपा से भक्त भी तद्रूप हो जाता है।